NEWS SAGA DESK
प्रयागराज:– इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री से आग्रह किया है कि अब समय आ गया है जब वरिष्ठ अधिकारियों और शीर्ष प्रशासनिक पदों पर बैठे अफसरों को उनके विभागों अथवा अधीनस्थ कर्मचारियों की चूक के लिए जवाबदेह तथा आवश्यक मामलों में आपराधिक रूप से भी जिम्मेदार ठहराया जाए।
न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की एकल पीठ ने कहा कि राज्य को “उच्च जिम्मेदारी” (हायर रिस्पॉन्सिबिलिटी) का सिद्धांत अपनाना चाहिए, जिसके तहत प्रशासनिक व्यवस्था में शीर्ष अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित हो। अदालत ने कहा कि यदि कोई अधिकारी अपने अधीनस्थों द्वारा किए गए गलत कार्यों, भ्रष्टाचार या अनियमितताओं को रोकने अथवा दोषियों को दंडित करने में विफल रहता है, तो उचित मामलों में उसकी आपराधिक जिम्मेदारी भी तय की जानी चाहिए।
अदालत ने अपने 16 पृष्ठों के आदेश में कहा कि वरिष्ठ अधिकारियों को अपने अधीन कार्यरत कर्मचारियों के आचरण और प्रदर्शन के लिए उत्तरदायी माना जाना चाहिए, क्योंकि प्रभावी सार्वजनिक सेवा सुनिश्चित करना उनकी प्रशासनिक और पेशेवर जिम्मेदारी है।
कोर्ट ने संस्थागत पतन के दो प्रमुख कारणों की भी चर्चा की। पहला “मन का भ्रष्टाचार”, जिसमें निजी हितों की पूर्ति के लिए निर्णय प्रक्रिया को जानबूझकर प्रभावित किया जाता है। दूसरा “पैसे का भ्रष्टाचार”, जिसमें सार्वजनिक पद का उपयोग निजी आर्थिक लाभ के लिए किया जाता है। अदालत ने कहा कि जहां भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी, रिकॉर्ड छिपाने, सरकारी आदेशों और राजपत्र अधिसूचनाओं की अवहेलना या राज्य की नीतियों को लागू करने में विफलता जैसी स्थितियां सामने आती हैं, वहां वरिष्ठ अधिकारियों की जवाबदेही आपराधिक दायित्व तक बढ़ाई जा सकती है।
यह टिप्पणी व्यवसायी अवनीश कुमार अग्रवाल द्वारा दायर याचिका की सुनवाई के दौरान की गई। याचिका में बरेली की विशेष अदालत के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें उनके पासपोर्ट नवीनीकरण के लिए अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) जारी करने की मांग खारिज कर दी गई थी। याचिकाकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि कुछ अज्ञात तत्वों ने सरकारी कार्यालय में आग लगाकर आधिकारिक अभिलेख नष्ट कर दिए थे।
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि एक प्राथमिकी की जांच लगभग 20 वर्षों से लंबित है, जबकि दूसरी प्राथमिकी में 18 वर्षों की देरी के बाद वर्ष 2024 में आरोप पत्र दाखिल किया गया। उनका कहना था कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोप उत्पीड़न की नीयत से लगाए गए हैं और हाईकोर्ट की एक समन्वय पीठ पहले ही संबंधित कार्यवाही पर रोक लगा चुकी है। इसी आधार पर उन्होंने एनओसी जारी करने की मांग की।
वहीं राज्य सरकार की ओर से आरोपों की गंभीरता का हवाला देते हुए याचिका का विरोध किया गया।
सुनवाई के दौरान अदालत ने वर्ष 2023 में दिए गए ‘मनीष कुमार सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’ मामले के आदेश का भी उल्लेख किया। उस फैसले में राज्य सरकार को भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी से जुड़े मामलों की जांच की निगरानी के लिए एक उच्च स्तरीय समिति गठित करने का निर्देश दिया गया था। अदालत को बताया गया कि 2023 के आदेश के बावजूद समिति का गठन दिसंबर 2025 में किया गया, वह भी लगभग दो वर्ष की देरी के बाद और तब जब वर्तमान मामले में अदालत ने संज्ञान लिया।
हालांकि अदालत ने इस मुद्दे पर आगे कोई कठोर आदेश पारित नहीं किया, लेकिन उम्मीद जताई कि वर्ष 2023 के फैसले में दिए गए निर्देशों का समयबद्ध अनुपालन किया जाएगा। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि नौकरशाही के कुछ वर्गों की असहयोगात्मक मानसिकता और मनमानी शक्तियां बनाए रखने की प्रवृत्ति न्यायिक निर्देशों के प्रभावी क्रियान्वयन में बड़ी बाधा है। अदालत के अनुसार यही प्रवृत्ति प्रशासनिक व्यवस्था में लालफीताशाही को बढ़ावा देती है।
न्यायमूर्ति दिवाकर ने कहा कि कानून और नियमों का उद्देश्य अनियंत्रित शक्तियों पर अंकुश लगाना और नियम आधारित प्रशासनिक संस्कृति को स्थापित करना है। अदालत ने यह भी कहा कि निर्णय सुरक्षित रखने के बाद उसने तीन माह से अधिक समय तक उच्च स्तरीय समिति की प्रगति रिपोर्ट का इंतजार किया, लेकिन फैसला सुनाए जाने तक कोई जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई।
अदालत ने इस स्थिति को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि मुख्य सचिव राज्य प्रशासन की केंद्रीय कड़ी होते हैं और उनके प्रतिनिधियों से विशेष सतर्कता तथा संस्थागत जिम्मेदारी की अपेक्षा की जाती है। अदालत ने यह भी कहा कि अतिरिक्त महाधिवक्ता को मुख्य सचिव के संवैधानिक और प्रशासनिक महत्व को समझते हुए अपने दायित्वों का निर्वहन अत्यधिक सावधानी के साथ करना चाहिए।
इसके साथ ही अदालत ने रजिस्ट्रार (अनुपालन) को निर्देश दिया कि आदेश की प्रमाणित प्रति तत्काल उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को भेजी जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि उच्च स्तरीय समिति की कार्यवाही समयबद्ध एवं प्रभावी ढंग से पूरी हो।
सबसे महत्वपूर्ण निर्देश देते हुए अदालत ने मुख्य सचिव को आदेश दिया कि वह इस फैसले को सीधे मुख्यमंत्री के समक्ष प्रस्तुत करें ताकि वे व्यक्तिगत रूप से इसका अवलोकन कर सकें और अदालत द्वारा व्यक्त चिंताओं पर उचित विचार कर सकें।
मामले के गुण-दोषों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए क्षेत्रीय पासपोर्ट प्राधिकरण, बरेली को निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार याचिकाकर्ता का पासपोर्ट जारी अथवा नवीनीकृत करने का निर्देश दिया।
No Comment! Be the first one.