रांची के पारस एचईसी हॉस्पिटल में रीढ़ के पास फंसी गोली निकालकर डॉक्टरों ने 62 वर्षीय मरीज की जान बचाई। सफल इमरजेंसी सर्जरी के बाद मरीज सात दिन में स्वस्थ होकर डिस्चार्ज हुआ। जानें पूरी खबर।
News Saga Desk
रांची: राजधानी रांची के पारस एचईसी हॉस्पिटल ने एक बार फिर अपनी अत्याधुनिक चिकित्सा सुविधाओं और विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम की बदौलत गंभीर रूप से घायल मरीज की जान बचाकर मिसाल पेश की है। अस्पताल में भर्ती कराए गए 62 वर्षीय मरीज, जिसकी रीढ़ (वर्टिब्रा) के पास गोली फंसी हुई थी, की सफल सर्जरी की गई। जटिल ऑपरेशन के बाद मरीज की हालत में लगातार सुधार हुआ और महज सात दिनों के भीतर उसे पूरी तरह हेमोडायनामिक रूप से स्थिर अवस्था में अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया गया।
जानकारी के अनुसार, लोधमा निवासी 62 वर्षीय व्यक्ति को गोली लगने के बाद गंभीर हालत में पारस एचईसी हॉस्पिटल के इमरजेंसी विभाग में लाया गया। अस्पताल पहुंचने के समय मरीज शॉक की स्थिति में था और उसकी हालत बेहद नाजुक थी। डॉक्टरों ने बिना समय गंवाए तत्काल प्राथमिक उपचार शुरू किया और मरीज को स्थिर करने के लिए रेससिटेशन (Resuscitation) की प्रक्रिया अपनाई।
तत्काल शुरू हुआ इलाज
मरीज की गंभीर स्थिति को देखते हुए विशेषज्ञ चिकित्सकों की टीम ने सबसे पहले आवश्यक जांच कराई। इसमें रक्त जांच, सीटी स्कैन और अन्य जरूरी परीक्षण शामिल थे। शरीर में अत्यधिक रक्तस्राव की संभावना को देखते हुए मरीज को ब्लड ट्रांसफ्यूजन भी दिया गया। सभी मेडिकल पैरामीटर स्थिर होने के बाद डॉक्टरों ने इमरजेंसी सर्जरी का फैसला लिया और मरीज को ऑपरेशन थिएटर में शिफ्ट किया गया।
वरिष्ठ सर्जन की टीम ने किया जटिल ऑपरेशन
सर्जरी का नेतृत्व वरिष्ठ सर्जन डॉ. अमरेंद्र कुमार सिंह ने अपनी अनुभवी मेडिकल टीम के साथ किया। ऑपरेशन के दौरान डॉक्टरों ने अत्यंत सावधानी के साथ रीढ़ के पास फंसी गोली को सफलतापूर्वक बाहर निकाला। यह सर्जरी काफी चुनौतीपूर्ण मानी जा रही थी क्योंकि गोली रीढ़ की हड्डी के बेहद नजदीक फंसी हुई थी और मामूली चूक भी गंभीर परिणाम दे सकती थी।
ऑपरेशन के दौरान कई महत्वपूर्ण प्रक्रियाएं की गईं, जिनमें—
- चेस्ट ट्यूब इंसर्शन
- मिनी थोराकोटॉमी
- बुलेट एक्सट्रैक्शन
- डायग्नोस्टिक लैप्रोस्कोपी
- अन्य आंतरिक चोटों की मरम्मत
इन सभी प्रक्रियाओं को सफलतापूर्वक पूरा किया गया, जिससे मरीज की जान बचाई जा सकी।
तीन दिन आईसीयू और चार दिन वार्ड में रखा गया
सर्जरी के बाद मरीज को लगातार निगरानी में रखने के लिए तीन दिनों तक आईसीयू में भर्ती रखा गया। इस दौरान डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ ने उसकी स्थिति पर लगातार नजर बनाए रखी। स्वास्थ्य में सुधार होने पर मरीज को सामान्य वार्ड में शिफ्ट किया गया, जहां अगले चार दिनों तक इलाज और देखभाल जारी रही।
चिकित्सकों के अनुसार मरीज की रिकवरी उम्मीद से बेहतर रही। सातवें दिन उसकी स्थिति पूरी तरह स्थिर हो गई और आवश्यक चिकित्सकीय जांच के बाद उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।
आधुनिक सुविधाओं और विशेषज्ञ टीम ने बचाई जान
पारस एचईसी हॉस्पिटल के फैसिलिटी डायरेक्टर डॉ. नीतेश कुमार ने बताया कि समय पर मिला इलाज, अनुभवी सर्जनों की टीम और अस्पताल में उपलब्ध आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं की वजह से मरीज की जान बचाई जा सकी।
उन्होंने कहा कि गोली लगने जैसी गंभीर ट्रॉमा की स्थिति में हर मिनट महत्वपूर्ण होता है। ऐसे मामलों में सही समय पर उपचार और विशेषज्ञ चिकित्सा टीम का समन्वय मरीज के जीवन और मृत्यु के बीच का अंतर साबित हो सकता है। इस मामले में सभी विभागों ने मिलकर तेजी से काम किया, जिससे सफल परिणाम सामने आया।
ट्रॉमा केयर में अस्पताल की विशेषज्ञता का उदाहरण
डॉ. नीतेश कुमार ने कहा कि यह मामला पारस एचईसी हॉस्पिटल रांची की ट्रॉमा केयर, इमरजेंसी चिकित्सा सेवाओं और जटिल सर्जिकल प्रक्रियाओं में विशेषज्ञता को दर्शाता है। अस्पताल में अत्याधुनिक ऑपरेशन थिएटर, आधुनिक डायग्नोस्टिक सुविधाएं और अनुभवी डॉक्टरों की टीम उपलब्ध है, जो गंभीर परिस्थितियों में भी मरीजों को बेहतर उपचार प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध है।
विशेषज्ञों का कहना है कि गोली लगने जैसी घटनाओं में मरीज को जल्द से जल्द किसी सक्षम ट्रॉमा सेंटर या मल्टीस्पेशियलिटी अस्पताल तक पहुंचाना बेहद जरूरी होता है। समय पर इलाज मिलने से गंभीर जटिलताओं और जान का जोखिम काफी हद तक कम किया जा सकता है।
इस सफल सर्जरी ने न केवल एक 62 वर्षीय मरीज को नई जिंदगी दी, बल्कि यह भी साबित किया कि आधुनिक चिकित्सा तकनीक, अनुभवी चिकित्सकों की टीम और त्वरित इमरजेंसी प्रबंधन के जरिए अत्यंत जटिल मामलों में भी बेहतर परिणाम हासिल किए जा सकते हैं।
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