भारत-ईरान रिश्तों में चाबहार पोर्ट की अहम भूमिका है। मोदी-पेजेशकियान मुलाकात, अमेरिकी प्रतिबंध और दोनों देशों के रणनीतिक हित समझिए।
भारत-ईरान रिश्ते एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के केंद्र में हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान की मुलाकात के बाद तेहरान ने नई दिल्ली के साथ अपने संबंधों को ऐतिहासिक और सभ्यतागत जुड़ाव वाला बताया है। दूसरी ओर, अमेरिका की ओर से ईरान पर लगाए गए प्रतिबंधों और दूसरे देशों द्वारा उनका उल्लंघन न करने की चेतावनी ने इस पूरे घटनाक्रम को और महत्वपूर्ण बना दिया है।

भारत-ईरान रिश्ते केवल कूटनीतिक संपर्क तक सीमित नहीं हैं। इनके पीछे ऊर्जा, व्यापार, क्षेत्रीय संपर्क, अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच तथा सबसे महत्वपूर्ण चाबहार पोर्ट जैसे रणनीतिक हित जुड़े हुए हैं। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि भारत के लिए ईरान क्यों महत्वपूर्ण है और अमेरिका की चिंताओं के बीच नई दिल्ली के सामने किस तरह की चुनौती है।
भारत के लिए चाबहार पोर्ट क्यों महत्वपूर्ण है?
भारत के लिए चाबहार बंदरगाह केवल समुद्री व्यापार का एक साधारण केंद्र नहीं है। यह भारत की रणनीतिक कनेक्टिविटी नीति का अहम हिस्सा है।
ईरान के दक्षिण-पूर्वी तट पर ओमान की खाड़ी के किनारे स्थित चाबहार के जरिए भारत पाकिस्तान को पार किए बिना अफगानिस्तान और आगे मध्य एशिया तक पहुंच बनाने की कोशिश कर सकता है।
भारत के लिए इसका महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि पाकिस्तान के साथ जटिल संबंधों के कारण उसके रास्ते होकर पश्चिम और मध्य एशिया तक सीधी व्यापारिक पहुंच सीमित है। चाबहार इस भौगोलिक चुनौती का वैकल्पिक रास्ता उपलब्ध कराता है।
चाबहार बंदरगाह में स्थित शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल भारत की रणनीतिक योजना का प्रमुख हिस्सा है। मई 2024 में भारत और ईरान ने टर्मिनल के विकास और संचालन को लेकर दीर्घकालिक समझौता किया था।
इस समझौते के जरिए भारत ने चाबहार में अपनी दीर्घकालिक भूमिका को मजबूत करने की दिशा में कदम बढ़ाया। यह बंदरगाह भारत को अफगानिस्तान के साथ व्यापार और मध्य एशियाई देशों तक पहुंच के लिए वैकल्पिक मार्ग देता है।
भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
भारत-ईरान रिश्ते और अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी के बीच संतुलन बनाना नई दिल्ली के लिए बड़ी चुनौती है।
एक तरफ ईरान भारत के लिए ऊर्जा, व्यापार और मध्य एशिया तक संपर्क के लिहाज से महत्वपूर्ण है। दूसरी तरफ अमेरिका भारत का प्रमुख रणनीतिक और आर्थिक साझेदार है।
भारत की विदेश नीति लंबे समय से अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर स्वतंत्र निर्णय लेने पर जोर देती रही है। इसलिए नई दिल्ली को ईरान के साथ अपने संबंधों को आगे बढ़ाते हुए अमेरिकी प्रतिबंधों और अंतरराष्ट्रीय नियमों से जुड़े जोखिमों का भी ध्यान रखना पड़ता है।
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