पुरुलिया की जयपुर राजबाड़ी में 1865 से सोने की दुर्गा की पूजा हो रही है। जानिए स्वर्ण प्रतिमा का इतिहास, अनोखी परंपराएं और सुरक्षा के विशेष इंतजाम।
News Saga Desk
पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले में स्थित जयपुर राजबाड़ी की सोने की दुर्गा की पूजा अपनी ऐतिहासिक विरासत और अनूठी धार्मिक परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है। वर्ष 1865 से यहां दुर्गापूजा का आयोजन किया जा रहा है। इस पूजा की सबसे बड़ी विशेषता देवी दुर्गा की स्वर्ण प्रतिमा है, जिसे सालभर बैंक के सुरक्षित लॉकर में रखा जाता है और पूजा के अवसर पर मंदिर में स्थापित किया जाता है। प्रतिमा के दर्शन के लिए हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। इस बार भी ऐतिहासिक पूजा को लेकर तैयारियां की गई हैं और प्रतिमा की सुरक्षा के लिए जिला पुलिस ने विशेष व्यवस्था की है।
350 साल पुरानी विरासत से जुड़ी है जयपुर राजबाड़ी
जयपुर राजपरिवार की परंपरा का इतिहास लगभग साढ़े तीन सौ साल पुराना बताया जाता है। राजपरिवार के वर्तमान सदस्य प्रशांत नारायण सिंहदेव के अनुसार, उनके पूर्वज जय सिंह वर्ष 1666 में मुगल बादशाह औरंगजेब के शासनकाल के दौरान उज्जैन से पुरुलिया के जंगलमहल क्षेत्र में आए थे।
उस समय इस क्षेत्र में भूमिज राजा खामार मुंडा का प्रभाव था। जय सिंह और खामार मुंडा के बीच युद्ध हुआ, जिसमें जय सिंह की जीत हुई। इसके बाद उन्होंने खामार मुंडा की तलवार को अपनी कुलदेवी के पास रखकर पूजा शुरू की। इस घटना को राजपरिवार की धार्मिक परंपरा के शुरुआती अध्यायों में गिना जाता है।
हालांकि, आज जयपुर राजबाड़ी की पहचान विशेष रूप से सोने की दुर्गा प्रतिमा और उससे जुड़ी पूजा पद्धति के कारण है। यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है।
मंदिर में आग लगने के बाद आया सोने की प्रतिमा का विचार
राजपरिवार के इतिहास में वर्ष 1864 की एक घटना ने पूजा का स्वरूप बदल दिया। जानकारी के अनुसार, जय सिंह की सातवीं पीढ़ी के मदनमोहन सिंह के पुत्र काशीनाथ सिंह के समय दुर्गापूजा के दौरान मंदिर की फूस की छत में दीपक से आग लग गई थी। आग इतनी भीषण थी कि पूरा ठाकुरबाड़ी परिसर जलकर राख हो गया।
इस घटना से राजा काफी दुखी हुए। राजपरिवार की परंपरा के अनुसार, इसके बाद उन्हें स्वप्न में देवी के दर्शन हुए। बताया जाता है कि देवी ने उन्हें बनारस की कनक दुर्गा के स्वरूप में प्रतिमा बनवाकर जयपुर में स्थापित करने का निर्देश दिया।
इसके बाद काशीनाथ सिंह बनारस से कुशल कारीगरों को लेकर आए। उन्होंने प्रतिमा निर्माण के लिए अपने खजाने से एक सेर, यानी 108 अकबरी सोने की अशर्फियां कलाकारों को दीं। प्रतिमा के पीछे सजावटी ढांचा तैयार करने के लिए लगभग दो मन चांदी का इस्तेमाल किया गया।

कारीगरों ने करीब एक वर्ष में प्रतिमा का निर्माण पूरा किया। वर्ष 1865 में स्वर्ण प्रतिमा की स्थापना के साथ जयपुर राजबाड़ी में नई परंपरा शुरू हुई, जो आज भी जारी है।
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डकैती के बाद बैंक लॉकर में रखी जाने लगी प्रतिमा
जयपुर राजबाड़ी की सोने की दुर्गा प्रतिमा की सुरक्षा का इतिहास भी काफी रोचक है। वर्ष 1970 में बीरेंद्र नारायण सिंहदेव के समय राजबाड़ी में डकैती हुई थी। डकैत घर के आभूषण लूटकर ले गए, लेकिन लाल कपड़े में लिपटी सोने की दुर्गा प्रतिमा को पहचान नहीं सके।
इस घटना के बाद जिला प्रशासन की सलाह पर प्रतिमा को बैंक के सुरक्षित लॉकर में रखने की व्यवस्था की गई। तभी से सामान्य दिनों में प्रतिमा बैंक में सुरक्षित रखी जाती है और दुर्गापूजा के दौरान उसे मंदिर में स्थापित किया जाता है।
इस व्यवस्था का उद्देश्य बहुमूल्य धार्मिक धरोहर को चोरी और अन्य संभावित खतरों से बचाना है। पूजा के दिनों में प्रतिमा के दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालुओं को भी सुरक्षा नियमों का पालन करना होता है।
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