JPSC-JSSC घोटाला: अभय तिवारी के निवेश का बड़ा खुलासा

NEWS SAGA DESK

JPSC-JSSC घोटाले की जांच में अभय तिवारी के कथित आर्थिक नेटवर्क का खुलासा हुआ है। मार्ट, शराब दुकान, होटल, मैनपावर और जमीन में निवेश की जांच जारी है।

रांची में चर्चित JPSC-JSSC घोटाला मामले की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, मुख्य आरोपी बताए जा रहे अभय तिवारी के कथित आर्थिक नेटवर्क को लेकर नए दावे सामने आ रहे हैं। जांच एजेंसियों के अनुसार, घोटाले से अर्जित कथित अवैध रकम को अलग-अलग कारोबार और संपत्तियों में निवेश किए जाने की जानकारी मिली है। इसमें मार्ट, शराब दुकान, होटल, मैनपावर कंपनी और जमीन की खरीद-बिक्री जैसे कारोबार शामिल बताए जा रहे हैं।

JPSC-JSSC घोटाला

जांच एजेंसियां इस कथित नेटवर्क में शामिल लोगों, निवेश के स्रोत और पैसों के लेन-देन की कड़ियों को जोड़ने में जुटी हैं। मामले में कई साझेदारों की भूमिका भी जांच के दायरे में बताई जा रही है।

जमशेदपुर के मार्ट और लातेहार की शराब दुकानों में निवेश का दावा

जांच से जुड़े सूत्रों के हवाले से सामने आई जानकारी के मुताबिक अभय तिवारी का कथित निवेश जमशेदपुर के दो मार्ट और लातेहार की दो शराब दुकानों में है। इन कारोबारों में आशीष नाम के एक कारोबारी की भागीदारी होने की बात कही जा रही है।

रिपोर्ट के अनुसार, आशीष के भाई के पुलिस विभाग में एक आईपीएस अधिकारी के अंगरक्षक के तौर पर काम करने की जानकारी भी जांच में सामने आई है। हालांकि, इस संबंध और कथित कारोबारी प्रभाव को लेकर जांच एजेंसियां तथ्यों की पुष्टि कर रही हैं। किसी व्यक्ति की पारिवारिक या पेशेवर पहचान अपने आप में अपराध में संलिप्तता का प्रमाण नहीं है।

ACF और FRO भर्ती में साढ़े पांच करोड़ की वसूली का आरोप

JPSC-JSSC घोटाला जांच में सरकारी भर्ती परीक्षाओं से जुड़े कथित लेन-देन का मामला भी महत्वपूर्ण बताया जा रहा है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक असिस्टेंट कंजरवेटर ऑफ फॉरेस्ट (ACF) और फॉरेस्ट रेंज ऑफिसर (FRO) भर्ती में करीब 5.5 करोड़ रुपये की कथित वसूली की बात सामने आई है।

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बताया गया है कि अभय तिवारी ने सीआईडी के समक्ष दिए गए बयान में इस वसूली की बात स्वीकार की है। आरोप के मुताबिक पद के हिसाब से उम्मीदवारों से 20 लाख से 35 लाख रुपये तक की रकम मांगे जाने की बात कही गई थी।

हालांकि, जांच के दौरान दिए गए किसी बयान या आरोप की कानूनी स्थिति अदालत में साक्ष्यों और अन्य प्रक्रियाओं के आधार पर तय होती है। इसलिए मामले में सामने आए दावों को अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं माना जा सकता।

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