News Saga Desk
Dumka जिला मुख्यालय स्थित पुराने समाहरणालय परिसर में शुक्रवार को पंचायत प्रज्ञा केंद्र संचालकों ने अपनी लंबित मांगों को लेकर जोरदार धरना-प्रदर्शन किया। जिले के विभिन्न प्रखंडों से पहुंचे संचालकों ने समस्याओं के समाधान की मांग करते हुए उपायुक्त को ज्ञापन सौंपा।
संचालकों का कहना है कि वे सरकार की लोक-कल्याणकारी योजनाओं और डिजिटल सेवाओं को ग्रामीण स्तर तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद वे आर्थिक तंगी और प्रशासनिक उपेक्षा का सामना कर रहे हैं।
मानदेय में भारी विसंगति का आरोप
प्रदर्शन कर रहे संचालकों ने मानदेय में भारी विसंगति का आरोप लगाया। उनका कहना है कि पंचायती राज समझौते के तहत उन्हें प्रतिमाह न्यूनतम 7,550 रुपये मानदेय मिलना चाहिए, लेकिन वर्तमान में केवल 2,475 रुपये का भुगतान किया जा रहा है।
संचालकों ने कहा कि मौजूदा महंगाई के दौर में इतनी कम राशि में परिवार का भरण-पोषण करना मुश्किल हो गया है। उन्होंने लंबित भुगतान को एकमुश्त जारी करने और न्यूनतम मानदेय लागू करने की मांग की।
प्रमाण पत्रों में सत्यापन अधिकार की मांग
आर्थिक मांगों के अलावा संचालकों ने जाति, निवास और आय प्रमाण पत्र जारी करने की प्रक्रिया में पंचायत प्रज्ञा केंद्र संचालकों का सत्यापन, मोहर और हस्ताक्षर अनिवार्य करने की मांग की।
उनका कहना है कि इससे पंचायत स्तर पर पारदर्शिता बढ़ेगी और बिचौलियों की भूमिका खत्म होगी। साथ ही वृद्धा, विधवा और सर्वजन पेंशन से जुड़े ऑनलाइन कार्य भी पूरी तरह पंचायत स्तर पर संचालित करने की मांग रखी गई।
सेवा शुल्क बढ़ाने की अपील
संचालकों ने मनरेगा जॉब कार्ड, डेटा एंट्री और मास्टर रोल जैसे कार्य पंचायत स्तर से संचालित कराने की मांग उठाई। उन्होंने कहा कि कार्य उपलब्ध हो या नहीं, उन्हें प्रतिदिन सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक केंद्र पर उपस्थित रहना अनिवार्य किया गया है, जबकि इसके बदले कोई निश्चित पारिश्रमिक नहीं दिया जाता।
उन्होंने सरकार से वर्तमान महंगाई दर को देखते हुए सेवा शुल्क में संशोधन करने की भी अपील की।
आंदोलन तेज करने की चेतावनी
धरना-प्रदर्शन में संघ के अध्यक्ष बिरेंद्र प्रसाद साह, सचिव हारून मियां, सह सचिव रूपेश कुमार, उपाध्यक्ष मुकेश कुमार पाल, कोषाध्यक्ष परितोष कुमार सहित बड़ी संख्या में पंचायत प्रज्ञा केंद्र संचालक मौजूद रहे।
संचालकों ने चेतावनी दी कि यदि जल्द उनकी मांगों पर सकारात्मक निर्णय नहीं लिया गया तो वे आगे उग्र आंदोलन करने को बाध्य होंगे।
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