रुपये की गिरती कीमत को संभालने के लिए रिजर्व बैंक ने कड़े नियम लागू किए हैं। जानें तेल कंपनियों के लिए नए निर्देश, आयातकों पर असर और आम जनता की जेब पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा।
अमेरिकी डॉलर के मुकाबले ऐतिहासिक निचले स्तर (97 के करीब) पर पहुंचे भारतीय रुपये को संभालने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बेहद सख्त कदम उठाए हैं। रिजर्व बैंक द्वारा हाल ही में उठाए गए इन कड़े कदमों का असर अब अंतर्राष्ट्रीय और ऑफशोर (ऑफशोर NDF) बाजारों में भी साफ दिखने लगा है।

वन-मंथ नॉन-डिलीवरेबल फॉरवर्ड्स (NDF) बाजार में रुपया डॉलर के मुकाबले मजबूत होकर सुधरने लगा है। पिछले कुछ हफ्तों में विदेशी मुद्रा भंडार में आई भारी गिरावट के चलते RBI को सट्टेबाजी रोकने और बाजार में डॉलर की आर्टिफिशल मांग को खत्म करने के लिए यह हस्तक्षेप करना पड़ा है।
RBI द्वारा उठाए गए प्रमुख सख्त कदम:
- तेल कंपनियों को सीधा डॉलर: सरकारी तेल कंपनियों को अपनी डॉलर की जरूरतें पूरी करने के लिए अब सीधे RBI की स्पेशल विंडो का इस्तेमाल करना होगा, जिससे वे आम बाजार से डॉलर नहीं खरीदेंगी।
- फारेन एक्सचेंज रिस्क रिजर्व: बैंकों के लिए 2 मिलियन डॉलर से ऊपर के इम्पोर्टर्स हेज का 20% रिस्क रिजर्व के रूप में RBI के पास जमा करना अनिवार्य कर दिया गया है।
- सट्टेबाजी पर शिकंजा: बिना वास्तविक लेनदेन वाले डेरिवेटिव पोजीशन की सीमा को 100 मिलियन डॉलर से घटाकर सीधे 5 मिलियन डॉलर कर दिया गया है। साथ ही कैंसल किए गए फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट्स को रीबुक करने पर रोक लगा दी गई है।
बाजार और आम जनता पर इसका प्रभाव विशेषज्ञों के मुताबिक, इन तात्कालिक उपायों से रुपये में रिकवरी देखने को मिल सकती है और यह 95-95.50 के दायरे में मजबूत हो सकता है। हालांकि, आयातकों के लिए हेजिंग महंगी होने से आयात लागत बढ़ सकती है। इसके अलावा, हाल ही में RBI द्वारा ब्याज दरों में उठाए गए कदमों के चलते त्योहारी सीजन में इलेक्ट्रॉनिक सामान, ऑटो पार्ट्स और अन्य आयातित वस्तुएं महंगी हो सकती हैं, साथ ही लोन की EMI पर भी असर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि ये उपाय तात्कालिक राहत जरूर देंगे, लेकिन अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों के कारण लंबी अवधि में स्थिरता बनाए रखने के लिए नीतिगत स्तर पर निरंतर निगरानी की आवश्यकता बनी रहेगी।
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