झारखंड हाईकोर्ट ने गिरिडीह डाकघर घोटाले में कर्मचारी के लंबे निलंबन को अनुचित माना और CAT का आदेश बरकरार रखते हुए केंद्र की याचिका खारिज कर दी।
झारखंड हाईकोर्ट ने गिरिडीह डाकघर घोटाले से जुड़े एक अहम मामले में केंद्र सरकार की रिट याचिका खारिज कर कर्मचारी शशि भूषण कुमार को राहत दी है। अदालत ने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें तीन महीने के बाद जारी निलंबन को नियमों के विपरीत माना गया था।

कोर्ट ने कहा कि लंबे समय तक बिना विभागीय आरोपपत्र के निलंबन जारी रखना कर्मचारी के अधिकारों को प्रभावित करता है। यह फैसला गिरिडीह डाकघर घोटाले के साथ-साथ सरकारी कर्मचारियों के निलंबन से जुड़े मामलों में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
CAT ने निलंबन पर दिया था अहम फैसला
शशि भूषण कुमार ने पहले विभागीय स्तर पर अपील की और राहत नहीं मिलने के बाद केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण का रुख किया। जुलाई 2025 में CAT ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि निलंबन के शुरुआती तीन महीने के भीतर विभागीय चार्जशीट जारी नहीं की गई थी। अधिकरण ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों और DoPT के दिशा-निर्देशों का हवाला देते हुए तीन महीने के बाद बढ़ाए गए निलंबन को निरस्त कर दिया। साथ ही कर्मचारी को निलंबन की आगे की अवधि का वेतन देने का निर्देश दिया गया, जिसमें पहले से प्राप्त निर्वाह भत्ते को समायोजित करने की बात कही गई थी।
केंद्र सरकार ने CAT के फैसले को चुनौती देते हुए झारखंड हाईकोर्ट में रिट याचिका दाखिल की थी। न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायमूर्ति संजय प्रसाद की खंडपीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद केंद्र की याचिका खारिज कर दी।
सात साल तक चली कार्रवाई पर भी सवाल
झारखंड हाईकोर्ट ने विभागीय कार्रवाई के लंबे समय तक चलने पर भी गंभीर टिप्पणी की। अदालत के मुताबिक, संबंधित कार्रवाई 2026 में पूरी हुई, यानी पूरी प्रक्रिया करीब सात वर्षों तक चलती रही। कोर्ट ने सवाल उठाया कि इतनी लंबी देरी के लिए जिम्मेदार कौन है। अदालत ने यह भी कहा कि विभागीय कार्रवाई को अनावश्यक रूप से लंबित रखना कर्मचारी के अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। यह टिप्पणी ऐसे मामलों में खास महत्व रखती है, जहां किसी कर्मचारी को जांच लंबित होने के कारण वर्षों तक निलंबित रखा जाता है।
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गिरिडीह डाकघर घोटाले से जुड़े इस मामले में हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के अजय कुमार चौधरी बनाम भारत संघ फैसले का भी उल्लेख किया। इस सिद्धांत के मुताबिक, निलंबन की अवधि को अनिश्चितकाल तक बढ़ाया नहीं जा सकता, खासकर तब जब निर्धारित अवधि के भीतर आरोपपत्र दाखिल न किया गया हो।
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