1946 के कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव में 12 समितियों का समर्थन मिलने के बाद भी सरदार पटेल ने अपनी उम्मीदवारी क्यों वापस ली थी? पढ़ें मणिबेन पटेल की डायरी और इस ऐतिहासिक घटना की विस्तृत रिपोर्ट।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में वर्ष 1946 का समय एक बेहद संवेदनशील, रोमांचक और निर्णायक मोड़ पर खड़ा था। देश लंबे संघर्ष के बाद आजादी की दहलीज पर था और ब्रिटिश हुकूमत से सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया पर चर्चा चल रही थी। ऐसे में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भीतर सर्वोच्च नेतृत्व यानी अध्यक्ष पद के चुनाव को लेकर सरगर्मी तेज हो गई थी। यह चुनाव केवल एक सांगठनिक पद के लिए नहीं था, बल्कि यह तय करने वाला था कि आजाद होने वाले भारत की अंतरिम सरकार की कमान किसके हाथों में होगी।

पटेल की मजबूत संगठनात्मक पकड़ और प्रांतीय समितियों का समर्थन
उस दौर में सरदार वल्लभभाई पटेल की संगठन पर मजबूत पकड़ जगजाहिर थी। बारदौली सत्याग्रह से लेकर भारत छोड़ो आंदोलन तक, पटेल ने जमीनी स्तर पर पार्टी को मजबूत करने और आंदोलनों को सफल बनाने में अहम भूमिका निभाई थी। यही कारण था कि जब कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए प्रांतीय कांग्रेस समितियों की राय ली गई, तो एक चौंकाने वाला लेकिन स्पष्ट बहुमत सामने आया।
विभिन्न राज्यों की 15 में से 12 प्रांतीय समितियों ने सरदार वल्लभभाई पटेल के नाम का आधिकारिक तौर पर समर्थन किया था। इसके विपरीत, जवाहरलाल नेहरू के नाम का प्रस्ताव किसी भी प्रांतीय समिति द्वारा नहीं भेजा गया था। सांगठनिक दृष्टिकोण से पटेल की दावेदारी बेहद मजबूत और अकाट्य मानी जा रही थी।
महात्मा गांधी की पसंद और नेहरू की स्थिति
तमाम सांगठनिक समर्थन के बावजूद, इस पूरी प्रक्रिया में महात्मा गांधी की इच्छा और दूरदृष्टि ने एक निर्णायक भूमिका निभाई। गांधीजी का मानना था कि अंग्रेजों के साथ सत्ता के इस नाजुक दौर में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान रखने वाले और आधुनिक दृष्टिकोण के नेता की आवश्यकता है। 20 अप्रैल 1946 को मौलाना अबुल कलाम आजाद को लिखे पत्र में गांधीजी ने स्पष्ट कर दिया था कि वे इस पद पर जवाहरलाल नेहरू को देखना चाहते हैं।
महात्मा गांधी की इस पसंद के बाद कांग्रेस के भीतर राजनीतिक समीकरण तेजी से बदले। हालांकि प्रांतीय समितियों ने नेहरू का नाम नहीं भेजा था, लेकिन कांग्रेस कार्यसमिति के स्तर पर उनका नाम आगे आया।
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