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रांची :- झारखंड आंदोलन के प्रमुख शिल्पकार, झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के संस्थापक और आदिवासी समाज के सर्वमान्य नेता शिबू सोरेन को मरणोपरांत देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान पद्म भूषण से सम्मानित किया जाएगा। नई दिल्ली में आयोजित समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु यह सम्मान प्रदान करेंगी। दिवंगत शिबू सोरेन की ओर से उनकी पत्नी रूपी सोरेन पुरस्कार ग्रहण करेंगी।
केंद्र सरकार ने 25 जनवरी को पद्म पुरस्कारों की घोषणा की थी। लोक कल्याण और समाज सेवा के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान को देखते हुए उन्हें पद्म भूषण सम्मान के लिए चुना गया है।
संघर्षों से भरा रहा जीवन
शिबू सोरेन का जन्म 11 जनवरी 1944 को झारखंड के रामगढ़ जिले के नेमरा गांव में हुआ था। उनके पिता सोबरन सोरेन की हत्या तब कर दी गई थी, जब शिबू सोरेन महज 13 वर्ष के थे। इस घटना ने उनके जीवन की दिशा बदल दी और उन्होंने महाजनी प्रथा तथा शोषण के खिलाफ संघर्ष का रास्ता चुना।
उन्होंने ग्रामीणों और आदिवासियों को संगठित कर उनकी जमीन वापस दिलाने के लिए आंदोलन चलाया। उनके नेतृत्व और संघर्ष से प्रभावित होकर लोग उन्हें “गुरुजी” कहने लगे। संथाल परगना क्षेत्र में उन्हें “दिशोम गुरु” के नाम से पहचान मिली।
जल, जंगल और जमीन की लड़ाई के प्रतीक
शिबू सोरेन को जल, जंगल और जमीन की लड़ाई के सबसे बड़े योद्धाओं में गिना जाता है। उन्होंने 1970 के दशक में झारखंड मुक्ति मोर्चा की स्थापना कर अलग झारखंड राज्य की मांग को संगठित स्वर दिया।
झारखंड राज्य के गठन में उनकी भूमिका को निर्णायक माना जाता है। उन्होंने आदिवासी, किसान, मजदूर और वंचित समुदायों की आवाज को गांवों से लेकर संसद तक पहुंचाया।
तीन बार मुख्यमंत्री, आठ बार सांसद
शिबू सोरेन का राजनीतिक जीवन चार दशकों से अधिक समय तक सक्रिय रहा। वह वर्ष 2005, 2008 और 2009 में तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री बने। इसके अलावा दुमका लोकसभा क्षेत्र से आठ बार सांसद चुने गए और राज्यसभा सदस्य भी रहे।
केंद्र सरकार में उन्होंने तीन अलग-अलग कार्यकाल में कोयला मंत्री के रूप में भी जिम्मेदारी निभाई। उनकी पहचान एक बेबाक और संघर्षशील आदिवासी नेता के रूप में रही, जिन्होंने अपने समुदाय के अधिकारों के लिए लगातार आवाज उठाई।
झारखंड आंदोलन के अमर नायक
समाजसेवी, आंदोलनकारी, सांसद और मुख्यमंत्री के रूप में शिबू सोरेन ने झारखंड की राजनीति और समाज पर अमिट छाप छोड़ी। वर्ष 2025 में 81 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया, लेकिन आदिवासी अस्मिता, सामाजिक न्याय और झारखंड आंदोलन में उनके योगदान को हमेशा याद किया जाएगा।
मरणोपरांत पद्म भूषण सम्मान उनके लंबे सामाजिक, राजनीतिक और जनआंदोलनों से जुड़े योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर मिली बड़ी मान्यता माना जा रहा है।
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