HEC रांची को केंद्र सरकार से आर्थिक मदद नहीं मिलेगी। मंत्रालय ने प्रबंधन को अपने संसाधनों से बकाया वेतन और सेवानिवृत्त कर्मचारियों का भुगतान करने का निर्देश दिया।
रांची: HEC कर्मचारियों को बड़ा झटका लगा है। रांची स्थित हैवी इंजीनियरिंग कॉरपोरेशन (HEC) को वित्तीय संकट से उबारने के लिए केंद्र सरकार से जिस आर्थिक सहायता की उम्मीद थी, वह फिलहाल पूरी होती नहीं दिख रही है। भारी उद्योग मंत्रालय ने स्पष्ट कर दिया है कि कंपनी को किसी प्रकार की अतिरिक्त वित्तीय सहायता नहीं दी जाएगी। इसके बजाय HEC प्रबंधन को अपने संसाधनों से कार्यशील पूंजी (वर्किंग कैपिटल) जुटाकर कर्मचारियों के बकाया वेतन और सेवानिवृत्त कर्मियों के लंबित भुगतान का समाधान करने का निर्देश दिया गया है। इस फैसले के बाद HEC कर्मचारियों को बड़ा झटका लगा है और यूनियनों में नाराजगी बढ़ गई है।

HEC की वित्तीय स्थिति क्यों बनी चिंता का विषय?
काफी समय से HEC गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रही है। कंपनी के उत्पादन और वित्तीय गतिविधियों पर इसका सीधा असर पड़ा है। प्रबंधन के अनुसार मौजूदा परिस्थितियों में नकदी की भारी कमी है, जिससे कर्मचारियों का वेतन और अन्य देनदारियां समय पर चुकाना संभव नहीं हो पा रहा है।
भारी उद्योग मंत्रालय से आर्थिक सहयोग नहीं मिलने के बाद HEC प्रबंधन ने कर्मचारी संगठनों को पत्र भेजकर अपनी वित्तीय स्थिति की जानकारी दी। पत्र में कहा गया है कि जब कंपनी की आय और उत्पादन में सुधार होगा, तभी चरणबद्ध तरीके से लंबित भुगतान किए जा सकेंगे।
34 महीने से अधिकारियों का वेतन लंबित
HEC कर्मचारियों को बड़ा झटका इसलिए भी माना जा रहा है क्योंकि लंबे समय से कर्मचारियों और अधिकारियों का वेतन बकाया है। हटिया कामगार यूनियन के अनुसार, अधिकारियों का लगभग 34 महीने का वेतन लंबित है, जबकि कर्मचारियों को करीब 30 महीनों से नियमित वेतन नहीं मिला है।

इसके अलावा जून 2018 से सेवानिवृत्त कर्मचारियों के ग्रेच्युटी, भविष्य निधि (PF) और अन्य सेवानिवृत्ति लाभों का भुगतान भी लंबित बताया गया है। अप्रैल 2017 से अवकाश नकदीकरण (लीव सैलरी) का भुगतान भी नहीं हो सका है। इन लंबित देनदारियों के कारण कर्मचारियों और उनके परिवारों को आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
अवैध कब्जों के खिलाफ HEC का अभियान
एक ओर कंपनी वित्तीय संकट से जूझ रही है, वहीं दूसरी ओर HEC नगर प्रशासन विभाग ने आवासीय परिसरों में अवैध कब्जों के खिलाफ कार्रवाई तेज कर दी है।
हालिया सर्वे में करीब 250 क्वार्टरों पर अवैध कब्जे की जानकारी सामने आई है। प्रबंधन ने संबंधित लोगों को नोटिस जारी कर 15 दिनों के भीतर आवास खाली करने का निर्देश दिया है। निर्धारित समय सीमा के बाद भी क्वार्टर खाली नहीं करने पर बलपूर्वक कार्रवाई की जाएगी। साथ ही कार्रवाई में आने वाला खर्च भी संबंधित कब्जाधारियों से वसूला जाएगा।
यूनियनों ने जताई नाराजगी
HEC कर्मचारियों को बड़ा झटका मिलने के बाद कर्मचारी संगठनों ने केंद्र सरकार के फैसले पर नाराजगी व्यक्त की है। हटिया मजदूर यूनियन के अध्यक्ष भवन सिंह ने कहा कि HEC केंद्र सरकार के अधीन सार्वजनिक क्षेत्र का महत्वपूर्ण उपक्रम है। ऐसे में कर्मचारियों के बकाया भुगतान और कंपनी के पुनरुद्धार के लिए सरकार को ठोस कदम उठाने चाहिए।
उन्होंने कहा कि यदि समाधान नहीं निकला तो यूनियन न्यायालय का रुख करेगी और आवश्यकता पड़ने पर आंदोलन भी किया जाएगा। कर्मचारी संगठनों का कहना है कि लंबे समय से वेतन और अन्य भुगतान लंबित रहने से कर्मचारियों का जीवन प्रभावित हो रहा है।
रांची के विधायक नवीन जायसवाल ने कहा कि HEC केवल एक औद्योगिक इकाई नहीं, बल्कि देश की प्रमुख “मदर इंडस्ट्री” है। उनके अनुसार कंपनी को बचाने के लिए राज्य और केंद्र सरकार को मिलकर सकारात्मक पहल करनी चाहिए ताकि उत्पादन, रोजगार और औद्योगिक गतिविधियों को गति मिल सके।
वहीं केंद्रीय रक्षा राज्य मंत्री संजय सेठ ने कहा कि उन्हें मंत्रालय के पत्र की विस्तृत जानकारी नहीं है। उन्होंने कहा कि पूरे मामले की समीक्षा करने के बाद ही वे इस विषय पर विस्तृत प्रतिक्रिया देंगे।
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भारी उद्योग मंत्रालय की ओर से HEC को अतिरिक्त आर्थिक सहायता नहीं देने का निर्णय सामने आया है। मंत्रालय ने कंपनी प्रबंधन को अपने संसाधनों से कार्यशील पूंजी जुटाने और कर्मचारियों के बकाया वेतन तथा सेवानिवृत्त कर्मियों के लंबित भुगतान की व्यवस्था करने का निर्देश दिया है।
फिलहाल प्रबंधन ने स्पष्ट किया है कि मौजूदा वित्तीय स्थिति में तत्काल भुगतान संभव नहीं है। भुगतान तभी किया जा सकेगा जब कंपनी की आर्थिक स्थिति और उत्पादन में सुधार होगा।
HEC के कर्मचारी अब प्रबंधन और सरकार के अगले कदम पर नजर बनाए हुए हैं। यदि कंपनी के लिए वैकल्पिक वित्तीय व्यवस्था नहीं होती है, तो वेतन और अन्य बकाया भुगतान में और देरी हो सकती है। दूसरी ओर यूनियनों ने कानूनी कार्रवाई और आंदोलन की चेतावनी देकर इस मुद्दे को और गंभीर बना दिया है। आने वाले दिनों में सरकार, प्रबंधन और कर्मचारी संगठनों के बीच होने वाली बातचीत इस मामले की दिशा तय कर सकती है।
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