रांची समाहरणालय में करमा पर्व की पूर्व संध्या पर सांस्कृतिक कार्यक्रम हुआ। DC मंजूनाथ भजन्त्री ने मांदर बजाया और प्रकृति संरक्षण का संदेश दिया।
News Saga Desk
रांची समाहरणालय में करमा पर्व की पूर्व संध्या पर शुक्रवार को सांस्कृतिक रंग देखने को मिला। ब्लॉक-बी सभागार में आयोजित करमा पूर्व संध्या समारोह झारखंड की समृद्ध आदिवासी संस्कृति, परंपरा और प्रकृति के प्रति गहरे जुड़ाव का जीवंत उदाहरण बना। कार्यक्रम में जिला दंडाधिकारी सह उपायुक्त रांची मंजूनाथ भजन्त्री और वरीय पुलिस अधीक्षक रांची राकेश रंजन संयुक्त रूप से शामिल हुए। पारंपरिक गीत, नृत्य और मांदर की थाप से पूरा सभागार उत्साह और सांस्कृतिक गरिमा से भर उठा।
दीप प्रज्ज्वलन से हुई कार्यक्रम की शुरुआत
समारोह की औपचारिक शुरुआत उपायुक्त मंजूनाथ भजन्त्री और एसएसपी राकेश रंजन ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्ज्वलित कर की। इस दौरान समाहरणालय कर्मियों ने दोनों अधिकारियों का पारंपरिक पगड़ी और शॉल भेंट कर स्वागत किया।
इसके बाद समाहरणालय कर्मियों ने पारंपरिक करमा गीत और आकर्षक नृत्य प्रस्तुत किए। गीत-संगीत और नृत्य की प्रस्तुतियों ने कार्यक्रम में मौजूद लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा। करमा पर्व की सांस्कृतिक झलकियों ने सभागार को झारखंड की लोक परंपराओं के रंग में रंग दिया।
प्रकृति के साथ सामंजस्य का संदेश
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उपायुक्त मंजूनाथ भजन्त्री ने कहा कि प्रकृति की पूजा और प्रार्थना का उद्देश्य आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा और प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवन है। उन्होंने झारखंड की संस्कृति, वेशभूषा, खान-पान और नृत्य के साथ-साथ पेड़ों एवं प्रकृति के प्रति लोगों के गहरे प्रेम की सराहना की।

उपायुक्त ने कहा कि झारखंड के लोग अपनी परंपराओं को सहेजते हुए उन्हें अगली पीढ़ी तक पहुंचा रहे हैं। उन्होंने समाहरणालय कर्मियों की भी प्रशंसा की और कहा कि यह खुशी की बात है कि कर्मचारी भी प्रकृति और स्थानीय परंपराओं से जुड़े हुए हैं।
उन्होंने कहा कि उपायुक्त सेल के कर्मी भी संस्कृति और परंपरा से जुड़कर इसका उदाहरण पेश कर रहे हैं। एसएसपी राकेश रंजन के प्रकृति पर्व से जुड़ाव पर भी उपायुक्त ने प्रसन्नता व्यक्त की।
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करमा पर्व से सीखने की जरूरत
उपायुक्त ने कहा कि करमा पर्व प्रकृति से जुड़ा पर्व है और झारखंड के आदिवासी समुदाय से यह सीखने की जरूरत है कि प्रकृति के साथ किस तरह जुड़कर जीवन जिया जा सकता है। उन्होंने परंपराओं को संरक्षित करने और उन्हें आगे बढ़ाने के महत्व पर जोर दिया।
उनके अनुसार, झारखंड की सांस्कृतिक परंपराओं में सामूहिकता, खुशी और आपसी प्रेम का भाव महत्वपूर्ण है। करमा जैसे पर्व लोगों को एक साथ जोड़ने और प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी का एहसास कराने का भी अवसर देते हैं।
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