करम देवता विवाद को लेकर रांची में आदिवासी संगठनों ने प्रेस वार्ता की। चर्चों में करम पर्व मनाने और धार्मिक परंपराओं में बदलाव के दावे पर आपत्ति जताई।
News Saga Desk
रांची में करम देवता विवाद को लेकर आदिवासी संगठनों की ओर से आपत्ति जताई गई है। 18 सितंबर 2026 को केंद्रीय सरना समिति और विभिन्न आदिवासी एवं जनजातीय सामाजिक संगठनों ने प्रेस क्लब रांची में संयुक्त प्रेस वार्ता कर इस मुद्दे पर अपना पक्ष रखा। संगठनों ने आरोप लगाया कि कुछ चर्चों और गिरजाघरों में करम देवता से जुड़े प्रतीकात्मक आयोजन किए जा रहे हैं और आदिवासी पर्व-त्योहारों को ईसाई तरीके से मनाने की कोशिश की जा रही है।
प्रेस वार्ता में संगठनों ने कहा कि करम पर्व आदिवासी समाज की आस्था, परंपरा और सामुदायिक संस्कृति से जुड़ा महत्वपूर्ण पर्व है। उनके अनुसार करम देवता की पूजा निर्धारित परंपराओं और विधि-विधान के साथ की जाती है। संगठनों ने चर्चों में करम देवता से जुड़े प्रतीकों की स्थापना को लेकर आपत्ति दर्ज कराते हुए इसे आदिवासी धार्मिक परंपराओं के साथ खिलवाड़ बताया।
करम देवता को लेकर क्या है विवाद
केंद्रीय सरना समिति और अन्य संगठनों का मुख्य आरोप है कि कुछ ईसाई संस्थाओं की गतिविधियों में आदिवासी पर्व-त्योहारों को ईसाई धार्मिक पद्धति के अनुरूप मनाने की बात कही गई है। प्रेस वार्ता में संगठनों ने कुछ पुस्तकों और धार्मिक सामग्री का हवाला देते हुए दावा किया कि आदिवासी त्योहारों के अध्ययन और संशोधन के बाद उन्हें ईसाई तरीके से मनाने की बात सामने आती है।

संगठनों का कहना है कि करम पूजा आदिवासी समाज की पारंपरिक धार्मिक व्यवस्था का हिस्सा है और इसके स्वरूप में किसी अन्य धार्मिक पद्धति के अनुसार बदलाव स्वीकार्य नहीं है। करम देवता विवाद को लेकर उन्होंने कहा कि ईसाई समुदाय अपने धार्मिक पर्व और त्योहार अपनी परंपरा के अनुसार मनाने के लिए स्वतंत्र है, लेकिन आदिवासी पर्व को आदिवासी नाम और पहचान के साथ अलग धार्मिक पद्धति में मनाने का वे विरोध करेंगे।
करम पर्व की परंपरा पर भी उठे सवाल
प्रेस वार्ता में आदिवासी संगठनों ने करम पर्व के दौरान होने वाले सामूहिक नृत्य और संगीत को लेकर की गई कथित टिप्पणियों पर भी आपत्ति जताई। संगठनों के अनुसार भादो एकादशी के अवसर पर आदिवासी समाज के लोग सामूहिक रूप से करम पूजा करते हैं और रातभर पारंपरिक नृत्य-संगीत के जरिए पर्व मनाते हैं।
संगठनों ने दावा किया कि इस सामूहिक आयोजन को गलत संदर्भ में प्रस्तुत कर इसे ‘बुरा करम’ कहने और आदिवासी समाज से ऐसी परंपराओं को हटाने की बात की जा रही है। समिति ने इसे आदिवासी समाज की सांस्कृतिक परंपराओं के प्रति आपत्तिजनक टिप्पणी बताया।
हालांकि, प्रेस वार्ता में लगाए गए ये आरोप संबंधित पक्ष के खिलाफ संगठनों द्वारा रखे गए दावे हैं। इन आरोपों पर संबंधित चर्च या ईसाई संस्थाओं की ओर से कोई प्रतिक्रिया इस प्रेस वार्ता की जानकारी में सामने नहीं आई है।
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उपायुक्त को पहले ही दिया गया आवेदन
आदिवासी संगठनों ने बताया कि इस मुद्दे को लेकर 16 सितंबर 2026 को रांची के उपायुक्त को लिखित आवेदन दिया गया था। इसमें कथित तौर पर चर्चों में करम देवता से जुड़े आयोजन और आदिवासी पर्व-त्योहारों को अलग धार्मिक पद्धति से मनाने पर रोक लगाने की मांग की गई है।
संगठनों का कहना है कि उनका विरोध किसी समुदाय के अपने धार्मिक पर्व मनाने को लेकर नहीं है। उनका कहना है कि आपत्ति तब है जब आदिवासी पर्व-त्योहारों को आदिवासी पहचान के साथ किसी अन्य धार्मिक पद्धति में मनाया जाए।
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