भारत में पटाखों का घरेलू बाजार 7,000 करोड़ रुपये का है, लेकिन वैश्विक निर्यात में हमारी हिस्सेदारी नाममात्र है। जानें शिवकाशी की ताकत और चीन के मुकाबले भारतीय पटाखा इंडस्ट्री क्यों पिछड़ जाती है।
भारत में दीवाली का मतलब ही रोशनी, उमंग और पटाखों का शोर होता है। लेकिन इस जश्न के शोर के बीच एक खामोशी भी छुपी है—वह है अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय पटाखों के निर्यात (Export) की खामोशी। दुनिया भर के पटाखा बाजारों पर चीन ने एकछत्र कब्जा कर रखा है। ‘ड्रैगन’ दुनियाभर को पटाखे बेचकर अरबों डॉलर कमा रहा है, जबकि भारत का निर्यात 8 करोड़ रुपये का आंकड़ा भी मुश्किल से छू पाता है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर अपने घरेलू बाजार में राज करने वाली हमारी पटाखा इंडस्ट्री सरहदों के पार क्यों फुस्स हो जाती है? कौन-सी वे नीतियां हैं जो ‘मेक इन इंडिया’ के इस शानदार उद्योग को ग्लोबल होने से रोक रही हैं? आइए जानते हैं इसके पीछे की पूरी कहानी।
भारत में सबसे ज्यादा पटाखे कहां बनते हैं?
भारत में पटाखों के कुल उत्पादन का 85 से 90 प्रतिशत हिस्सा तमिलनाडु के शिवकाशी शहर में तैयार होता है। शिवकाशी को ‘भारत की पटाखा राजधानी’ और ‘छोटा जापान’ के नाम से भी जाना जाता है। दक्षिणी तमिलनाडु में स्थित यह शहर मदुरै से लगभग 74 किमी दूर है। 15वीं शताब्दी में पांड्य राजा हरिकेसरी परक्किरमा पांडियन ने काशी से एक शिवलिंग लाने के बाद इसका नाम ‘शिवकाशी’ रखा था।
हमारा घरेलू पटाखा बाजार काफी बड़ा है, जिसका अनुमानित मूल्य लगभग 7,000 करोड़ रुपये है। ‘तमिलनाडु फायरवर्क्स एंड एमोर्सेस मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन’ (TANFAMA) के आंकड़ों के मुताबिक, कारखानों में होने वाला उत्पादन करीब 2,000 करोड़ रुपये का है, जबकि बाकी 5,000 करोड़ रुपये का कारोबार थोक व्यापार, माल ढुलाई और रिटेल मार्जिन से आता है। भारत में बनने वाले 99% से ज्यादा पटाखे देश के भीतर ही खप जाते हैं, जिसमें अकेले दिवाली के आसपास के 30 दिनों में 4,000 करोड़ रुपये की बिक्री होती है। स्थानीय मांग इतनी ज्यादा है कि निर्माताओं के पास विदेशों का रुख करने की कोई खास वजह नहीं बचती।
ग्लोबल मार्केट में चीन का दबदबा क्यों है?
अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत की नगण्य हिस्सेदारी (महज 0.042%) के मुकाबले चीन का दबदबा हैरान करने वाला है। चीन हर साल 1.1 अरब डॉलर से 1.23 अरब डॉलर (लगभग 1 लाख करोड़ रुपये) मूल्य के पटाखे निर्यात करता है।
चीन के हुनान प्रांत का लियुयांग शहर दुनिया की पटाखा राजधानी (World Fireworks Capital) कहलाता है। अकेले यह शहर चीन की घरेलू सप्लाई का 60% और ग्लोबल एक्सपोर्ट का 70% हिस्सा तैयार करता है। विशेष औद्योगिक क्लस्टर, सस्ती मजदूरी, आसानी से मिलने वाला कच्चा माल और सरकारी समर्थन चीन की इस ताकत के मुख्य आधार हैं। पीढ़ियों के अनुभव और मजबूत डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क के दम पर चीन आज अमेरिका, जर्मनी और ब्रिटेन जैसे बड़े बाजारों पर राज कर रहा है।
भारतीय पटाखे विदेश क्यों नहीं जा पाते? (प्रमुख रुकावटें)
भारतीय पटाखा उद्योग के ग्लोबल न होने के पीछे कई बड़े नीतिगत और ढांचागत कारण हैं:
- कड़े नियम और लालफीताशाही: ‘एक्सप्लोसिव्स रूल्स 2008’ के तहत पटाखों को कम खतरे वाले विस्फोटक माना जाता है, लेकिन तमिलनाडु में इन्हें ‘रेड कैटेगरी’ में रखा गया है। उद्योग जगत लंबे समय से मांग कर रहा है कि इन्हें “कम जोखिम वाले पाइरोटेक्निक” (White Category) में रखा जाए ताकि बंदरगाहों से आसानी से मंजूरी मिल सके। इस लालफीताशाही के कारण ट्रांसपोर्ट और इंश्योरेंस की लागत बहुत बढ़ जाती है।
- केमिकल से जुड़ी पाबंदियां: साल 2018 में प्रदूषण नियंत्रण के नाम पर सुप्रीम कोर्ट ने बेरियम नाइट्रेट के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया, जबकि दुनिया भर के 80% पटाखों में इसी का उपयोग होता है। पश्चिमी देश ‘पोटेशियम परक्लोरेट’ जैसे विकल्पों की मांग करते हैं, लेकिन भारत में इसके इस्तेमाल पर भी कड़े प्रतिबंध हैं।
- एमएसएमई (MSMEs) का बिखरा हुआ दायरा: भारतीय कंपनियां छोटे स्तर के उद्यमों में बंटी हुई हैं। इस कारण वे बड़े पैमाने पर उत्पादन और अमेरिका व यूरोपीय यूनियन द्वारा मांगे जाने वाले कड़े अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मानकों को पूरा करने में असमर्थ रहती हैं।
यदि सरकार लॉजिस्टिक्स को आसान बनाए और नियमों में थोड़ा लचीलापन लाए, तो शिवकाशी का यह पारंपरिक उद्योग वैश्विक बाजार में भी भारत का परचम लहरा सकता है।
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