NEWS SAGA DESK
भागलपुर : विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर बिहार कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू) सबौर के मृदा विज्ञान विभाग ने भारतीय मृदा सर्वेक्षण एवं भूमि उपयोग योजना सोसायटी, सबौर चैप्टर के सहयोग से “बिहार में उर्वरक खपत को कम करने की रणनीतियाँ” विषय पर विचार-मंथन सत्र का आयोजन किया। कार्यक्रम का उद्देश्य कृषि उत्पादकता बनाए रखते हुए उर्वरकों के संतुलित उपयोग और टिकाऊ कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देना था।
कार्यक्रम का आयोजन कुलपति डी. आर. सिंह के संरक्षण में किया गया। सत्र की अध्यक्षता मृदा विज्ञान विभाग के अध्यक्ष अंशुमान कोहली ने की।
कार्यक्रम की शुरुआत कुलपति द्वारा पौधारोपण के साथ हुई। इस दौरान राष्ट्रीय सेवा योजना (एनएसएस) के स्वयंसेवकों ने भी पौधारोपण अभियान में भाग लेते हुए पर्यावरण संरक्षण और हरित बिहार का संदेश दिया।
स्वागत भाषण में डॉ. अंशुमान कोहली ने बढ़ती उर्वरक लागत, घटती पोषक तत्व उपयोग दक्षता और पर्यावरणीय चुनौतियों के बीच संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन की आवश्यकता पर जोर दिया।
मुख्य वक्ता बिजय सिंह ने उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से होने वाले दुष्प्रभावों का उल्लेख करते हुए एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन, मृदा परीक्षण आधारित उर्वरक अनुशंसा और प्रिसिजन न्यूट्रिएंट मैनेजमेंट को अपनाने की जरूरत बताई।
कुलपति डॉ. डी. आर. सिंह ने कहा कि बिहार में कृषि की दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए वैज्ञानिक और टिकाऊ पोषक तत्व प्रबंधन रणनीतियों को अपनाना आवश्यक है।
तकनीकी सत्र में विशेषज्ञों ने उर्वरक खपत कम करने के विभिन्न उपायों पर अपने विचार रखे। वी. पी. रमणी ने प्राकृतिक खेती और पोषक तत्व पुनर्चक्रण की संभावनाओं पर प्रकाश डाला, जबकि सत्येन्द्र कनौजिया ने “मिट्टी की मुस्कान” अवधारणा के माध्यम से मृदा स्वास्थ्य सुधार और कम लागत वाले जैविक विकल्पों पर चर्चा की।
वहीं संजय अरोड़ा ने सूक्ष्मजीव आधारित इनोकुलेंट्स की भूमिका को रेखांकित करते हुए बताया कि इससे पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ती है और रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता कम होती है।
धन्यवाद ज्ञापन के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ। इस अवसर पर वक्ताओं, प्रतिभागियों, एनएसएस स्वयंसेवकों और आयोजन समिति के योगदान की सराहना की गई।
No Comment! Be the first one.