NEWS SAGA DESK
गुवाहाटी:- असम विधानसभा द्वारा समान नागरिक संहिता (यूसीसी) असम विधेयक-2026 पारित किए जाने के बाद राज्य में इसके संभावित प्रभावों को लेकर व्यापक चर्चा शुरू हो गई है। संवैधानिक स्वीकृति मिलने के बाद यह कानून राज्य की नागरिक व्यवस्था, पारिवारिक कानूनों और प्रशासनिक तंत्र में महत्वपूर्ण बदलाव ला सकता है।
प्रस्तावित यूसीसी को असम में पिछले कई दशकों के सबसे महत्वपूर्ण नागरिक कानून सुधारों में से एक माना जा रहा है। राज्य सरकार और विधेयक के समर्थकों का कहना है कि इससे लैंगिक न्याय को बढ़ावा मिलेगा, कानूनी पारदर्शिता बढ़ेगी और विवाह, तलाक तथा पारिवारिक मामलों के लिए एक समान नागरिक ढांचा तैयार होगा।
विधेयक का सबसे अधिक असर महिलाओं के अधिकारों और कानूनी सुरक्षा पर पड़ने की संभावना जताई जा रही है। सरकार का तर्क है कि एकपत्नी प्रथा लागू होने और विवाह तथा तलाक के अनिवार्य पंजीकरण से परित्याग, भरण-पोषण, उत्तराधिकार और वैवाहिक विवादों से जुड़े मामलों में महिलाओं को अधिक कानूनी संरक्षण मिलेगा। साथ ही आधिकारिक दस्तावेजीकरण की व्यवस्था से अपंजीकृत विवाहों और उनसे जुड़े शोषण के मामलों में कमी आने की उम्मीद है।
विधेयक में लिव-इन संबंधों के अनिवार्य पंजीकरण का भी प्रावधान किया गया है। समर्थकों के अनुसार इससे ऐसे संबंधों में रहने वाली महिलाओं और बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा मजबूत होगी। वहीं आलोचकों का मानना है कि यह प्रावधान निजता के अधिकार और व्यक्तिगत संबंधों में सरकारी हस्तक्षेप को लेकर नई बहस खड़ी कर सकता है।
कानून लागू होने के बाद राज्य सरकार को विवाह, तलाक और लिव-इन संबंधों के पंजीकरण के लिए जिला एवं ग्रामीण स्तर पर विशेष व्यवस्था विकसित करनी होगी। इसके लिए डिजिटल डेटाबेस, सत्यापन प्रणाली और शिकायत निवारण तंत्र स्थापित करने की आवश्यकता होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे प्रशासनिक कार्यप्रणाली में व्यापक परिवर्तन देखने को मिल सकते हैं।
यूसीसी विधेयक समान नागरिक कानून और सांस्कृतिक विविधता के संरक्षण के बीच संतुलन को लेकर नई कानूनी और संवैधानिक बहस को भी जन्म दे सकता है। हालांकि राज्य सरकार ने अनुसूचित जनजातियों और आदिवासी समुदायों को इसके दायरे से बाहर रखने की बात कही है, फिर भी पारंपरिक कानूनों और विशेष छूट की सीमाओं को लेकर चर्चा जारी रहने की संभावना है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि असम का यह कदम देशभर में समान नागरिक संहिता को लेकर चल रही बहस को नई दिशा दे सकता है। आगामी चुनावों के संदर्भ में भी यह मुद्दा राजनीतिक और वैचारिक विमर्श का महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है। समर्थक इसे कानून के समक्ष समानता की दिशा में अहम पहल बता रहे हैं, जबकि विरोधी इसे व्यक्तिगत और सामुदायिक परंपराओं में हस्तक्षेप के रूप में देख रहे हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार शुरुआती चरण में वकीलों, पारिवारिक अदालतों, पंजीकरण कार्यालयों और स्थानीय प्रशासनिक संस्थाओं पर अतिरिक्त कार्यभार बढ़ सकता है। हालांकि लंबे समय में नागरिक अभिलेखों के डिजिटलीकरण से प्रशासनिक दक्षता में सुधार और पारिवारिक विवादों में कानूनी अस्पष्टता कम होने की संभावना व्यक्त की जा रही है।
असम के मुख्यमंत्री Himanta Biswa Sarma ने कहा है कि यह कानून सामाजिक न्याय, पारदर्शिता और समान अधिकार सुनिश्चित करने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि राज्य के स्वदेशी और जनजातीय समुदायों को प्राप्त संवैधानिक संरक्षण यथावत बनाए रखा जाएगा।
फिलहाल विधेयक राज्यपाल और राष्ट्रपति की स्वीकृति की प्रतीक्षा में है। मंजूरी मिलने के बाद राज्य सरकार इसके क्रियान्वयन के लिए विस्तृत नियमावली और प्रक्रियाओं को अधिसूचित कर सकती है
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