News Saga Desk
देश की राजधानी दिल्ली में 24 मई को ऐतिहासिक लाल किला मैदान जनजातीय सांस्कृतिक चेतना का केंद्र बनने जा रहा है। भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती के अवसर पर आयोजित “जनजातीय सांस्कृतिक समागम” में देशभर के 550 से अधिक आदिवासी समुदायों के एक लाख से ज्यादा लोगों के शामिल होने की संभावना है। इस भव्य आयोजन को जनजातीय समाज की सांस्कृतिक अस्मिता, सामाजिक चेतना और राष्ट्रीय पहचान के प्रतीक के रूप में देखा जा रहा है।
कार्यक्रम में केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होंगे। इसके अलावा विभिन्न राज्यों से जनजातीय प्रतिनिधि, सामाजिक कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी और सांस्कृतिक दल भी इस आयोजन में भाग लेंगे।
पहली बार लाल किला बनेगा जनजातीय सांस्कृतिक चेतना का केंद्र
आयोजकों के अनुसार ऐतिहासिक लाल किला परिसर पहली बार इतने बड़े स्तर पर जनजातीय समाज की सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक एकता का मंच बनेगा। आयोजन का उद्देश्य केवल सांस्कृतिक प्रदर्शन नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की पहचान, अधिकारों और राष्ट्रीय जीवन में उसकी भूमिका को प्रमुखता से सामने लाना है।
550 से अधिक जनजातीय समुदायों की होगी भागीदारी
देश के उत्तर-पूर्वी राज्यों, मध्य भारत के वनांचलों, पश्चिमी भारत के आदिवासी बहुल क्षेत्रों, दक्षिण भारत और अंदमान-निकोबार द्वीप समूह से बड़ी संख्या में जनजातीय प्रतिनिधि दिल्ली पहुंचेंगे। आयोजकों का दावा है कि अधिकांश लोग अपने संसाधनों और सामुदायिक सहयोग से इस कार्यक्रम में शामिल हो रहे हैं।
जनजातीय समाज के लोगों का कहना है कि यह केवल एक सम्मेलन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक अधिकारों से जुड़ा भावनात्मक आंदोलन है।
गांवों और जंगलों तक चला जनसंपर्क अभियान
इस आयोजन का नेतृत्व जनजातीय सुरक्षा मंच कर रहा है। मंच के राष्ट्रीय संयोजक गणेस राम भगत की अगुवाई में पिछले कई महीनों से देशभर में व्यापक जनसंपर्क अभियान चलाया गया।
कार्यकर्ताओं ने गांवों, जंगलों, पहाड़ी इलाकों और दूरस्थ आदिवासी बस्तियों तक पहुंचकर लोगों को सम्मेलन के उद्देश्य, सांस्कृतिक एकता और संवैधानिक अधिकारों के प्रति जागरूक किया।
कई राज्यों से विशेष तैयारियां
मध्य प्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान और पूर्वोत्तर राज्यों से हजारों प्रतिनिधियों के दिल्ली पहुंचने की तैयारी की गई है। मध्य प्रदेश के महाकौशल, मालवा और निमाड़ क्षेत्रों से बड़ी संख्या में लोगों के लिए विशेष ट्रेनों में टिकट बुक कराए गए हैं।
वहीं अंदमान एवं निकोबार द्वीप समूह से लोग जलमार्ग के जरिए चेन्नई पहुंच चुके हैं और वहां से ट्रेन द्वारा दिल्ली आ रहे हैं।
सामाजिक और संवैधानिक मुद्दों पर भी होगा मंथन
सम्मेलन में केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम ही नहीं होंगे, बल्कि जनजातीय पहचान, सामाजिक अधिकारों और संवैधानिक मुद्दों पर भी चर्चा की जाएगी। कई जनजातीय संगठनों का मानना है कि जो लोग अपनी पारंपरिक संस्कृति, रीति-रिवाज और सामाजिक पहचान से पूरी तरह अलग हो चुके हैं, उन्हें जनजातीय आरक्षण और विशेष सुविधाओं का लाभ नहीं मिलना चाहिए।
पांच मार्गों से निकलेगी भव्य शोभायात्रा
24 मई की शाम मुख्य कार्यक्रम से पहले दिल्ली के पांच अलग-अलग मार्गों से भव्य शोभायात्राएं निकाली जाएंगी। इनमें देशभर से आए जनजातीय प्रतिनिधि पारंपरिक वेशभूषा में लोकगीत, लोकनृत्य और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां देंगे।
ढोल, मांदर, नगाड़ों और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की गूंज के बीच निकलने वाली ये यात्राएं राजधानी में जनजातीय संस्कृति की जीवंत झलक पेश करेंगी।
बिरसा मुंडा के संघर्ष और बलिदान को किया जाएगा याद
सम्मेलन में भगवान बिरसा मुंडा के संघर्ष, बलिदान और सामाजिक चेतना को विशेष रूप से याद किया जाएगा। उन्हें भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में आदिवासी समाज की आवाज़ और ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।
आयोजन में उनके जीवन और विचारों पर आधारित सांस्कृतिक प्रस्तुतियां, विचार गोष्ठियां और प्रेरक संबोधन भी आयोजित किए जाएंगे। आयोजकों का मानना है कि लाल किले की ऐतिहासिक धरती पर होने वाला यह आयोजन भविष्य में जनजातीय समाज की नई सामाजिक, सांस्कृतिक और वैचारिक चेतना के प्रतीक के रूप में याद किया जाएगा।
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