World Heart Day 2026: जमशेदपुर में दिल की बीमारियां अब युवाओं और बच्चों को भी अपनी चपेट में ले रही हैं। जानिए कम उम्र में हार्ट अटैक के कारण, ‘गोल्डन ऑवर’ का महत्व और बचाव के जरूरी उपाय।
जमशेदपुर: भागदौड़ भरी जिंदगी, अनियंत्रित खानपान और अत्यधिक मानसिक तनाव के बीच अब दिल की बीमारियां उम्र की मोहताज नहीं रह गई हैं। कभी 60 वर्ष की आयु के बाद आम मानी जाने वाली हृदय संबंधी समस्याएं अब तेजी से देश के युवाओं और यहां तक कि छोटे बच्चों को भी अपनी चपेट में ले रही हैं। विश्व हृदय दिवस के अवसर पर जमशेदपुर के चिकित्सा जगत से आए आंकड़े बेहद डराने वाले हैं। ब्रह्मानंद अस्पताल, तामोलिया के प्रख्यात हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. राम नरेश राय के अनुसार, आज की आधुनिक जीवनशैली शहर के युवाओं के दिलों की धड़कनें बिगाड़ रही है।

युवाओं के कंधों पर तनाव का भारी बोझ
कॉरपोरेट जगत की अंतहीन डेडलाइन, काम के अनिश्चित घंटे, फास्ट फूड की लत और हर वक्त स्क्रीन से चिपकी रहने वाली जिंदगी युवाओं के स्वास्थ्य पर भारी पड़ रही है। इसके अलावा युवाओं में सिगरेट, वेपिंग और शराब का बढ़ता चलन रक्त नलिकाओं (Arteries) को सीधे तौर पर भारी नुकसान पहुंचा रहा है।
जमशेदपुर के पिछले पांच वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि अस्पताल पहुंचने वाले हृदय रोगियों में 35 प्रतिशत तक युवा ऐसे हैं जिनकी उम्र 40 साल से कम है। इनमें 25 से 40 वर्ष के वे युवा भी शामिल हैं जिन्हें अचानक मैसिव कार्डियक अरेस्ट या दिल का दौरा पड़ा है। जिस उम्र में युवाओं को अपने करियर की उड़ान भरनी चाहिए, उस उम्र में वे अस्पतालों के कैथ लैब और आईसीयू के चक्कर काटने को मजबूर हैं।
‘गोल्डन ऑवर’ और हाई बीपी की अनदेखी जानलेवा
डॉ. राम नरेश राय का कहना है कि हार्ट अटैक के मामलों में सबसे बड़ी चुनौती समय की होती है। अटैक आने के शुरुआती 60 मिनट को मेडिकल साइंस की भाषा में ‘गोल्डन ऑवर’ कहा जाता है। यदि इस एक घंटे के भीतर मरीज को कैथ लैब युक्त अस्पताल पहुंचाकर उसकी बंद नस खोल दी जाए, तो दिल की मांसपेशियों को होने वाले स्थायी नुकसान से बचाया जा सकता है।
लेकिन आमतौर पर लोग सीने के भारीपन या जबड़े-पीठ के दर्द को साधारण गैस या मांसपेशियों का खिंचाव मानकर नजरअंदाज कर देते हैं, जो बाद में जानलेवा साबित होता है। इसके अलावा साइलेंट किलर बनता हाई ब्लड प्रेशर भी युवाओं के लिए बड़ी मुसीबत बनता जा रहा है।
30 की उम्र के बाद नियमित जांच है जरूरी
हर्ज़ रोग विशेषज्ञ डॉ. संतोष गुप्ता की सलाह है कि यदि परिवार में हृदय रोगों का इतिहास रहा है, तो 25 की उम्र से ही सतर्क हो जाना चाहिए।
- नियमित जांच: 30 वर्ष की आयु के बाद हर व्यक्ति को साल में कम से कम एक बार लिपिड प्रोफाइल, ईसीजी और ब्लड शुगर की जांच जरूर करानी चाहिए।
- डाइट और वॉक: रोज 30 से 40 मिनट की टहलना और संतुलित खानपान को अपनाना आवश्यक है। अपने भोजन में हरी सब्जियां, फल, फाइबर और मोटे अनाज (मिलेट्स) को शामिल करें। तला-भुना, मैदा और चीनी का सेवन कम से कम करें।
- नींद और स्क्रीन टाइम: रात को समय पर सोएं और 7 से 8 घंटे की गहरी नींद लें। सोने से कम से कम एक घंटा पहले मोबाइल स्क्रीन से दूरी बना लें। धूम्रपान और तंबाकू का सेवन दिल के लिए जहर समान है, इसे तुरंत छोड़ दें।
- एमजीएम अस्पताल के शिशु रोग विभाग के एचओडी डॉ. केके चौधरी ने चिंता जताते हुए कहा कि अब बच्चों में भी हृदय संबंधी समस्याएं उभरने लगी हैं। बच्चों में बढ़ता मोटापा, घंटों स्क्रीन के सामने बैठना, आउटडोर खेलों से दूरी और पढ़ाई का तनाव उनके कार्डियोवैस्कुलर सिस्टम को सीधे तौर पर प्रभावित कर रहा है। ओपीडी में आने वाले हर पांच में से दो बच्चे ओवरवेट या मोटापे के शिकार मिल रहे हैं।
चिप्स, बर्गर, पिज्जा और कोल्ड ड्रिंक्स में मौजूद अत्यधिक सोडियम और ट्रांस फैट कम उम्र में ही धमनियों में प्लाक (Plaque) जमा कर रहा है, जिससे बच्चों में हाई बीपी और कोलेस्ट्रॉल बढ़ने की समस्या आम हो गई है। ऑनलाइन गेमिंग के चलते बच्चों का स्क्रीन टाइम 6 से 8 घंटे तक पहुंच गया है, जिससे उनका मेटाबॉलिज्म सुस्त पड़ रहा है। लगातार स्क्रीन पर रहने और परीक्षा के तनाव से ‘कोर्टिसोल’ (तनाव हार्मोन) बढ़ता है, जो दिल की धड़कनें अनियमित कर कम उम्र में खतरे को कई गुना बढ़ा देता है।
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