सांची से मंगोलिया पहुंचे बुद्ध के प्रमुख शिष्यों के पवित्र अवशेष, भव्य स्वागत

NEWS SAGA DESK

भोपाल :- मध्य प्रदेश के विश्व धरोहर स्थल सांची में संरक्षित भगवान बुद्ध के प्रमुख शिष्यों अरहंत सारिपुत्र और अरहंत मौद्गल्यायन के पवित्र अवशेष मंगोलिया पहुंच गए हैं। वहां इन अवशेषों का श्रद्धा और सम्मान के साथ भव्य स्वागत किया गया। इन्हें मंगोलिया की प्रसिद्ध गंदन मॉनेस्ट्री में सार्वजनिक दर्शन के लिए रखा जाएगा।

इन पवित्र अवशेषों को 28 मई को भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय और मध्य प्रदेश शासन के संस्कृति विभाग के निर्देश पर सांची से मंगोलिया के लिए रवाना किया गया था। इस अवसर पर पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री प्रह्लाद पटेल, महाबोधी सोसायटी श्रीलंका के प्रमुख वानगल उपतिस्स नायक थेरो तथा कलेक्टर अरुण कुमार विश्वकर्मा उपस्थित रहे थे।

जनसंपर्क अधिकारी अनुराग उइके के अनुसार, 31 मई को असम के राज्यपाल लक्ष्मण प्रसाद आचार्य भारतीय वायु सेना के विशेष विमान से इन पवित्र अवशेषों को लेकर मंगोलिया पहुंचे। वहां हवाई अड्डे पर मंगोलिया के शिक्षा मंत्री एल. एंख-अमगलान और गंडनतेगचेनलिंग मठ के मुख्य महंत खाम्बा नोमुन खान गेशे ल्हारम्पा डी. जावज़ानदोरज ने उनका औपचारिक स्वागत किया।

अवशेषों की यात्रा के दौरान मार्ग में बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे और उन्होंने श्रद्धाभाव से नमन किया। प्रतिनिधिमंडल में मध्य प्रदेश के संस्कृति एवं पर्यटन विभाग के अपर मुख्य सचिव शिव शेखर शुक्ला, अंतरराष्ट्रीय बौद्ध परिसंघ (आईबीसी) के प्रतिनिधि तथा भारत और श्रीलंका के वरिष्ठ बौद्ध भिक्षु भी शामिल थे। मंगोलिया में आयोजित स्वागत समारोह में कई प्रमुख मठों के महंत, बौद्ध भिक्षु और देश के पूर्व राष्ट्रपति नामबारिन एंखबयार भी उपस्थित रहे।

9 जून तक होंगे सार्वजनिक दर्शन

गंदन मॉनेस्ट्री में इन पवित्र अवशेषों को 9 जून 2026 तक सार्वजनिक दर्शन के लिए रखा जाएगा। इस दौरान हजारों श्रद्धालुओं के दर्शन करने की संभावना है। अधिकारियों के अनुसार यह पहल भारत और मंगोलिया के बीच सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक संबंधों को और मजबूत करेगी तथा दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान को नई गति देगी।

बौद्ध पर्यटन को मिलेगा बढ़ावा

इस पहल से भारत के बौद्ध तीर्थ सर्किट, विशेषकर सांची जैसे ऐतिहासिक स्थलों के प्रति अंतरराष्ट्रीय आकर्षण बढ़ने की उम्मीद है। इससे मध्य प्रदेश के बौद्ध पर्यटन स्थलों को वैश्विक पहचान मिलेगी और विदेशी पर्यटकों की संख्या में वृद्धि हो सकती है। साथ ही दोनों देशों के मठों, सांस्कृतिक संस्थानों और संग्रहालयों के बीच सहयोग के नए अवसर भी विकसित होंगे।

उल्लेखनीय है कि यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल सांची स्तूप विश्व के सबसे प्राचीन और महत्वपूर्ण बौद्ध केंद्रों में से एक है। यहां संरक्षित अरहंत सारिपुत्र और अरहंत मौद्गल्यायन के पवित्र अवशेष बौद्ध समुदाय के लिए अत्यंत श्रद्धा का विषय हैं। दोनों को बौद्ध संघ का ‘अग्र युग्म’ माना जाता है और बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार में उनके योगदान को आज भी विशेष सम्मान के साथ याद किया जाता है।

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