स्वतंत्रता सेनानी मातंगिनी हाजरा की पुण्यतिथि पर CM शुभेंदु ने दी श्रद्धांजलि

स्वतंत्रता सेनानी मातंगिनी हाजरा की पुण्यतिथि पर मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने श्रद्धांजलि दी। जानिए गांधी बुढ़ी के जीवन, स्वतंत्रता संग्राम और उनके ऐतिहासिक बलिदान की पूरी कहानी।

News Saga Desk

कोलकाता। पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने मंगलवार को स्वतंत्रता सेनानी मातंगिनी हाजरा की पुण्यतिथि पर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट साझा कर उनके आत्मबलिदान को याद किया। मुख्यमंत्री ने अपने संदेश में कहा, “गांधी बुढ़ी, शहीद वीरांगना मातंगिनी हाजरा के आत्मबलिदान दिवस पर सश्रद्ध प्रणाम।” स्वतंत्रता संग्राम में मातंगिनी हाजरा का योगदान भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष करते हुए उन्होंने अपने प्राणों की आहुति दी थी। तिरंगे के प्रति उनकी अटूट निष्ठा और अदम्य साहस आज भी देशवासियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने दी श्रद्धांजलि

पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने मातंगिनी हाजरा के बलिदान दिवस पर उन्हें याद करते हुए श्रद्धांजलि दी। उनके सोशल मीडिया संदेश में स्वतंत्रता सेनानी के प्रति सम्मान और कृतज्ञता का भाव दिखाई दिया। मुख्यमंत्री ने उन्हें गांधी बुढ़ी और शहीद वीरांगना के रूप में संबोधित करते हुए उनके आत्मबलिदान को नमन किया।

मातंगिनी हाजरा ने देश की आजादी के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया था। उन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी निभाई। उनका संघर्ष केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं था, बल्कि वह देश की आजादी के लिए आम लोगों को भी प्रेरित करती थीं। उनकी पुण्यतिथि पर दी गई श्रद्धांजलि स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान को याद करने का अवसर है।

कौन थीं मातंगिनी हाजरा, जिन्हें कहा जाता था गांधी बुढ़ी

मातंगिनी हाजरा का जन्म 19 अक्टूबर 1870 को तत्कालीन मेदिनीपुर जिले के तमलुक क्षेत्र के होगला गांव में हुआ था। उन्हें लोकप्रिय रूप से गांधी बुढ़ी के नाम से जाना जाता था। महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित होकर उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई थी। उनके साहस और देश के प्रति समर्पण के कारण उन्हें बंगाल में विशेष पहचान मिली।

मातंगिनी हाजरा

मातंगिनी हाजरा ने ऐसे समय में स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लिया, जब महिलाओं की सार्वजनिक और राजनीतिक गतिविधियों में भागीदारी सीमित थी। इसके बावजूद उन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ आंदोलनों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

उनकी देशभक्ति, साहस और संघर्षशील व्यक्तित्व ने उन्हें बंगाल के स्वतंत्रता आंदोलन की प्रमुख महिला सेनानियों में शामिल किया।

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भारत छोड़ो आंदोलन में निभाई अहम भूमिका

वर्ष 1942 में महात्मा गांधी के नेतृत्व में शुरू हुए भारत छोड़ो आंदोलन ने देशभर में ब्रिटिश शासन के खिलाफ व्यापक जनआंदोलन का रूप ले लिया था। बंगाल में भी इस आंदोलन का प्रभाव देखने को मिला। इस दौरान मातंगिनी हाजरा ने ब्रिटिश शासन के विरोध में सक्रिय भागीदारी निभाई।

29 सितंबर 1942 को तमलुक में निकाले गए एक जुलूस में वह शामिल हुई थीं। इस जुलूस का उद्देश्य ब्रिटिश शासन के खिलाफ विरोध दर्ज कराना था। उस समय स्वतंत्रता सेनानियों और प्रदर्शनकारियों पर अंग्रेजी प्रशासन की सख्ती लगातार बढ़ रही थी।

मातंगिनी हाजरा भी आंदोलनकारियों के साथ आगे बढ़ रही थीं। इसी दौरान पुलिस ने जुलूस पर गोलीबारी कर दी। गोलीबारी में मातंगिनी हाजरा गंभीर रूप से घायल हुईं और अंततः उन्होंने देश के लिए अपने प्राणों का बलिदान कर दिया।

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