डॉल्फिन संरक्षण के लिए प्रयास तेज, लेकिन अभयारण्य विकास पर उठ रहे सवाल

NEWS SAGA DESK

भागलपुर :- गंगा डॉल्फिन के संरक्षण और संवर्धन के लिए बिहार में लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से राज्य में प्रत्येक वर्ष 5 अक्टूबर को डॉल्फिन दिवस मनाया जाता है। राष्ट्रीय जलीय जीव घोषित गंगा डॉल्फिन की सुरक्षा के लिए केंद्र और राज्य सरकार विभिन्न योजनाओं के माध्यम से कार्य कर रही हैं।

पटना विश्वविद्यालय परिसर में गंगा नदी के किनारे देश का पहला राष्ट्रीय डॉल्फिन अनुसंधान केंद्र (एनडीआरसी) स्थापित किया गया है, जहां डॉल्फिन के व्यवहार, संरक्षण और आवास संबंधी विषयों पर शोध किया जाता है।

भागलपुर जिले में सुल्तानगंज से कहलगांव तक गंगा नदी के लगभग 60 किलोमीटर लंबे क्षेत्र को विक्रमशिला गांगेय डॉल्फिन अभयारण्य घोषित किया गया है। इस क्षेत्र में डॉल्फिन संरक्षण के लिए अवैध शिकार और प्रतिबंधित मछली पकड़ने के तरीकों पर विशेष निगरानी रखी जाती है।

केंद्र सरकार की प्रोजेक्ट डॉल्फिन योजना के तहत बिहार में डॉल्फिन की संख्या बढ़ाने, उनके प्राकृतिक आवास को सुरक्षित रखने और गंगा नदी को प्रदूषणमुक्त बनाने की दिशा में काम किया जा रहा है। वहीं, बिहार सरकार वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया के सहयोग से स्थानीय मछुआरों और ग्रामीणों को जागरूक करने के अभियान भी चला रही है।

नमामि गंगे योजना के तहत गंगा नदी में प्रदूषण कम करने के प्रयास किए जा रहे हैं, ताकि जैव विविधता को संरक्षित रखा जा सके और जलीय जीवों की संख्या में वृद्धि हो। इसके अलावा गंगा प्रहरी और डॉल्फिन मित्र भी संरक्षण अभियान में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। विश्व बैंक और वन विभाग के सहयोग से स्थानीय युवाओं और मछुआरों को प्रशिक्षित कर डॉल्फिन मित्र बनाया गया है, ताकि संकट में फंसी डॉल्फिन को समय पर बचाया जा सके।

पर्यावरणविद दीपक कुमार उर्फ झुन्नू का कहना है कि सरकारी प्रयासों का सकारात्मक प्रभाव देखने को मिला है। अवैध शिकार की घटनाओं में कमी आई है और डॉल्फिन की संख्या भी काफी हद तक स्थिर बनी हुई है। उनका मानना है कि गंगा डॉल्फिन का संरक्षण तभी संभव है जब गंगा नदी को स्वच्छ और सुरक्षित रखा जाए। इसके लिए सभी संबंधित पक्षों को समन्वय के साथ काम करना होगा।

हालांकि, गांगेय डॉल्फिन के संरक्षण और भागलपुर स्थित विक्रमशिला डॉल्फिन अभयारण्य के विकास को लेकर प्रशासनिक सुस्ती पर सवाल उठ रहे हैं। जानकारी के अनुसार, अभयारण्य के लिए एनओसी और क्लीयरेंस मद में करोड़ों रुपये की राशि उपलब्ध है, लेकिन विकास योजनाएं अब तक धरातल पर नहीं उतर सकी हैं।

नियमों के अनुसार इस राशि का उपयोग अभयारण्य के विकास, पर्यटन सुविधाओं के विस्तार और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने के लिए किया जाना चाहिए था, लेकिन अब तक कोई उल्लेखनीय कार्य नहीं हुआ है। इससे संरक्षण कार्यों की गति को लेकर चिंता बढ़ रही है।

उल्लेखनीय है कि गंगा डॉल्फिन मछलियों से भरपूर, अपेक्षाकृत शांत और गहरे जल वाले क्षेत्रों में निवास करती है। वर्ष 2009 में इसे भारत का राष्ट्रीय जलीय जीव घोषित किया गया था। इसके शिकार पर पूर्ण प्रतिबंध है और वन्यजीव संरक्षण कानून के तहत इसकी सुरक्षा सुनिश्चित की गई है।

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