News Saga Desk
नई दिल्ली। देश के कई राज्यों में इन दिनों भीषण गर्मी का प्रकोप जारी है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात और दिल्ली समेत कई इलाके तेज गर्म हवाओं और उच्च तापमान की चपेट में हैं। इसी बीच वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि इस वर्ष सामान्य एल-नीनो के बजाय ‘सुपर एल-नीनो’ की स्थिति बनने की आशंका है, जिससे मानसून कमजोर पड़ सकता है और गर्मी व सूखे के नए रिकॉर्ड बन सकते हैं।
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) ने हाल ही में कहा है कि मई से जुलाई के बीच एल-नीनो की स्थिति विकसित हो सकती है। इसका असर भारत समेत पूरे दक्षिण एशिया के मौसम पर देखने को मिल सकता है। पहले यह अनुमान लगाया गया था कि एल-नीनो का प्रभाव मानसून के दूसरे चरण यानी अगस्त-सितंबर में दिखेगा, लेकिन अब इसके पहले ही सक्रिय होने की संभावना जताई जा रही है।
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) पहले ही इस वर्ष सामान्य से कम बारिश का अनुमान जारी कर चुका है। विभाग के मुताबिक इस बार मानसून सामान्य का लगभग 92 प्रतिशत रह सकता है। मानसून कमजोर रहने से खेती, जल संसाधन और पेयजल व्यवस्था पर सीधा असर पड़ सकता है। भारत में करीब 70 प्रतिशत बारिश मानसून के जरिए होती है, जिससे कृषि और जलाशयों को पर्याप्त पानी मिलता है।
विशेषज्ञों के अनुसार यदि बारिश कम हुई तो फसल उत्पादन प्रभावित होगा, जल संकट बढ़ेगा और महंगाई का दबाव भी बढ़ सकता है।
क्या है एल-नीनो?
एल-नीनो एक जलवायु संबंधी स्थिति है, जो हर 2 से 7 साल के बीच विकसित होती है और लगभग 9 से 12 महीने तक बनी रह सकती है। इसके प्रभाव से दुनिया के विभिन्न हिस्सों में तापमान और वर्षा के पैटर्न में बदलाव आता है।
सामान्य परिस्थितियों में प्रशांत महासागर के पूर्वी हिस्से का पानी ठंडा और पश्चिमी हिस्से का पानी गर्म रहता है। पूर्व से पश्चिम की ओर चलने वाली ट्रेड विंड्स गर्म पानी को पश्चिम की ओर धकेलती रहती हैं। लेकिन जब ये हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं, तब समुद्र के तापमान और मौसम के संतुलन में बदलाव आता है, जिसे एल-नीनो कहा जाता है।
एल-नीनो के दौरान भारत, ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया के कई हिस्सों में कम बारिश और सूखे की स्थिति बन सकती है। वहीं दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका और अमेरिका के कुछ हिस्सों में अधिक बारिश होती है।
कब बनती है सुपर एल-नीनो की स्थिति?
जब मध्य प्रशांत महासागर का तापमान सामान्य से 2 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक बढ़ जाता है, तब ‘सुपर एल-नीनो’ की स्थिति मानी जाती है। वर्ष 1950 के बाद अब तक केवल तीन बार—1982, 1997 और 2015 में—सुपर एल-नीनो दर्ज किया गया है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि इस वर्ष एल-नीनो सुपर एल-नीनो में बदलता है, तो इसका सबसे बड़ा असर भारतीय मानसून पर पड़ेगा और देश को भीषण गर्मी, सूखा और जल संकट जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
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