कोलकाता में तीन दिवसीय गौड़ीय नृत्य कार्यशाला शुरू हुई। 50 विद्यार्थी प्रशिक्षण ले रहे हैं। मंत्री ने इस पारंपरिक नृत्यशैली के संरक्षण पर जोर दिया।
News Saga Desk
कोलकाता। पश्चिम बंगाल राज्य नृत्य अकादमी के तत्वावधान में शनिवार को तीन दिवसीय गौड़ीय नृत्य कार्यशाला का शुभारंभ हुआ। टॉलीगंज स्थित पश्चिम बंगाल राज्य नृत्य अकादमी भवन में आयोजित इस कार्यशाला का उद्घाटन राज्य की सूचना एवं संस्कृति तथा पर्यटन विभाग की राज्यमंत्री पूर्णिमा चक्रवर्ती ने किया। कार्यशाला में कुल 50 विद्यार्थी हिस्सा ले रहे हैं और उन्हें बंगाल की पारंपरिक नृत्यशैली के इतिहास, स्वरूप और सांस्कृतिक महत्व से परिचित कराया जा रहा है।
बंगाल की सांस्कृतिक विरासत से जुड़ा है गौड़ीय नृत्य
उद्घाटन कार्यक्रम में मंत्री पूर्णिमा चक्रवर्ती ने कहा कि बंगाल की साहित्यिक और सांस्कृतिक परंपरा में संकीर्तन का विशेष स्थान रहा है। इसी सांस्कृतिक धारा से गौड़ीय नृत्य का भी गहरा संबंध है। उन्होंने कहा कि यह नृत्यशैली बंगाल की विरासत का अभिन्न हिस्सा है, लेकिन वर्तमान समय में इसका प्रचलन धीरे-धीरे कम होता जा रहा है।

मंत्री के अनुसार, पारंपरिक कला रूपों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए संस्थागत प्रयास आवश्यक हैं। इसी उद्देश्य से पश्चिम बंगाल राज्य नृत्य अकादमी की ओर से कार्यशाला का आयोजन किया गया है। दूर-दराज के क्षेत्रों से पहुंचे विद्यार्थियों की उत्साहपूर्ण भागीदारी को उन्होंने इस पहल के लिए महत्वपूर्ण बताया।
तीन दिवसीय कार्यशाला में 50 विद्यार्थी शामिल
कार्यशाला में 50 विद्यार्थी भाग ले रहे हैं। तीन दिनों तक चलने वाले इस आयोजन के माध्यम से प्रतिभागियों को गौड़ीय नृत्य की परंपरा और इससे जुड़े विभिन्न सांस्कृतिक पहलुओं की जानकारी दी जा रही है।
कार्यशाला का उद्देश्य केवल नृत्य की तकनीकी जानकारी देना ही नहीं, बल्कि विद्यार्थियों को इस कला की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से जोड़ना भी है। आयोजकों का मानना है कि युवा पीढ़ी की भागीदारी से पारंपरिक नृत्यशैलियों के संरक्षण और प्रचार को नई दिशा मिल सकती है।
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संकीर्तन अकादमी स्थापित करने की घोषणा
कार्यक्रम के दौरान पूर्णिमा चक्रवर्ती ने भविष्य में संकीर्तन अकादमी स्थापित किए जाने की घोषणा भी की। उन्होंने बंगाल के भावी नृत्यप्रेमियों से गौड़ीय नृत्य के इतिहास और परंपरा से जुड़ने का आह्वान किया।
उन्होंने कहा कि बंगाल की सांस्कृतिक पहचान से जुड़े इस नृत्य रूप को व्यापक मंच मिलना चाहिए। उनके संदेश में इसे केवल राज्य तक सीमित रखने के बजाय देश और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गौरव के साथ प्रस्तुत करने पर भी जोर दिया गया।
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